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अन्ना का आन्दोलन दाल में कुछ काला है

Posted On: 31 Aug, 2011 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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अन्ना का आन्दोलन भ्रष्टाचार के पर्ती जागरूकता पैदा करता बेशक लगता हो लेकिन एक बात तो सच है अन्ना आन्दोलन की वजह से शीला की कुर्सी बच गयी है .कोम्न्वेल्थ घोटालो को लेकर जो जनता दिल्ली की मुख्यमंत्री को कोस रही थी और विपक्ष भी अपनी धार पैनी कर रहा था वही जनता अपनी उर्जा को वन्दे मातरम और अन्ना आन्दोलन में लगाने लगी .वैसे कुछ लोग यह कह सकते है की इस आन्दोलन का लाभ अगले चुनावों में विपक्ष को मिलेगा .परन्तु सच तो यह है अगले चुनावो में अभी सालो का वक्त बचा है और सरकार का कार्यकाल अभी लंबा है .और तब तक हमारे देश के लोग भूल जायेंगे कोन सा आन्दोलन और कोन से घोटाले और कोन से अन्ना ..जिस तरह से मिडिया ने अन्ना का भरपूर साथ दिया कही न कही शक होता है दाल में कुछ तो काला है .क्यों की जो मिडिया राष्ट्रहित के मुद्दों पर कोई टिप्पणी तक नही करता वही मीडिया रात दिन अन्ना के आन्दोलन को हवा देता रहा और उस पर कोई करवाई भी नही हुई .बेशक से अन्ना जी एक सवच्छ छवि के जननेता है लेकिन लगता है वह राजनीती के शिकार हुए है . जिस देश में सांसद तो क्या कैबिनेट मंत्री भी कोई टिप्पणी देने में पार्टी हाईकमान के आदेश का इंतज़ार करते हो वह अगर खुलकर पार्टी की बगावत करे और उन पर कोई करवाई न हो तो क्या कहिएगा ? गड़बड़ तो है कही न कही लेकिन परते खुलने में वक्त लगेगा

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2 प्रतिक्रिया

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bharodiya के द्वारा
August 31, 2011

देखो भाई आपने अन्ना मुवमेन्ट के टाईमिंग पर सवाल किया है । ईस समय आसमान शीला और कोम्न्वेल्थ घोटालो के बादलो से घीरा है । आपके अनुसार बादल को हटने का ईन्तजार करना चाहिए । लेकिन साहब बदलो का तो सिलसिला चालु है । एक के बाद एक आता रहेगा । कब करे अन्ना अपना काम ? आप तो केहते रहेंगे ईस बादल को भी जाने देते । आपने ठीक कहा अगले चुनावमे लोग भुल जायेंगे । बाकी सब भुल जायेन्गे लेकिन अन्ना को नही । अन्ना उस समय कोई बयान दे देंगे तो काफी फरक पडेगा । चुनाव मे हमारे सामने घोटालेबाजों को ही रख्खा जाता है । तो लोग छोटे घोटालेवालों को ही पसन्द करेंगे । मिडिया के बारेमे ईस फोरममे काफी लिखा गया है जरा देख लेना । उसका चरित्र क्या है समजमे आ जायेगा । ईस बार बात अलग थी, अन्नाका प्रताप था । हवाका रुख ही बदल गया था । कोई मिडिया की औकात नही थी की वो अन्ना की आंधी के विरुध्ध खडा हो जाये । राजनीती का अर्थ बहुत बुरा समजा जाता है आज । ईस से डर कर आन्ना पार्टी भी केहती रही की वो राजनीति नही करते । आप राजाको बोलो अपनी नीति बदलो तो वो राजनीति नही है तो क्या है । चुनाव मे खडे रेहना चाहते हो या नही वो तो अलग बात है । लेकिन ईस बात को ही लोग राजनीति समज बैठे है , और उसे नफरत करते है । हालां की सरकार से कोई भी मांग करो वो राजनीति से परे नही है । हम भी यहा पॉलिटिकल एक्सप्रेस ने लिखते है वो भी एक छोटीसी राजनीति ही है । हम ईस का ईन्कार करे तो वो हमारी दोगलीनीति बन जाती है । सभी हाईकमान जनता की नजरो से गीर चुके है । अपने बागी सांसदो के खिलाफ कारवाई करके सांसद भी हाथ से जायेगा और जनताकी नजरो से और नीचे गीर जायेगा । ऐसा कौन चाहेगा ?

    vikasmehta के द्वारा
    September 1, 2011

    bharodiya जी इस आन्दोलन का फायेदा शीला को तो पंहुचा ही साथ ही साथ राहुल गाँधी के परधन मंत्री पद तक पहुचने का रास्ता भी साफ होता जा रहा है और जहा तक मिडिया की बात है वह तो हमेशा से ही सत्तारूढ़ दल का साथी रहा है


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