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भटकते युवक - युवतियां व्यवस्था का दोष

Posted On: 8 Jul, 2012 Others में

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प्रत्येक माँ बाप अपने लड़के – लड़कियों को पढाई के लिए किसी अच्छे संसथान में भेजना चाहते हैं जो सामर्थ्य होते हैं वह भेजते हैं ! जहां लड़के और लडकियां किसी पिजी अथवा होस्टल में रहते हैं ! अनजान शहर नये चहरे और नई उम्र ! बुलंद होसले , जोश से भरे ऐसे युवक – युवतियां घर से काफी दूर रहते हैं ! ऐसे में नया माहोल , आधुनिकता , और अकेलेपन से घीरे युवक – युवतियां शहरी माहोल में ढलने लगते हैं ! जिसके परिणाम सवरूप छोटे शहरो से आये युवक – युवतियां अपने दायरे से निकल कर लड़के और लड़की की सीमाओं को पाटने ( तोड़ने ) लगते हैं ! जिसके फलस्वरूप ऐसे संस्थानों में लड़के और लड़की का साथ रहना बोलना घूमना आदि को फ्रंद्शिप नाम दिया जाता है यानी दोस्ती ! जहां युवक – युवतियों को अपने घर की किसी ख़ुशी में शामिल करते हैं वाही युवतियां भी ! लेकिन एक कडवी सच्चाई यह भी है की इस तरह की दोस्ती देसी भाषा में कहू तो सेटिंग होती है अथवा प्यार ! यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य बात है की 90 % ऐसी दोस्ती टाईमपास भी कहलाती है ! जिसमे लड़के और लडकियां शारीरिक सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं ! प्यार – शादी तो बहुत कम लोग ५ , १० लोग ही करते हैं ! एसा नही हो सकता की इन हालत से कोई भी माँ – बाप वाकिफ न हो ! एक वह भी जमाना था जब लड़की का घर से दूर जाना भारतीय समाज में अच्छा नही माना जाता था लेकिन आज जमाना कुछ और है जिसमे हर किसी को आगे निकलना है ! किसी को पडोसी से तो किसी को रिश्तेदार से ! इसी वजह से माँ – बाप मोन हैं………… लेकिन इन सबके बीच इस भाग्दोड़ी प्रतियोगिता में कुछ तो है जो हम खो रहे हैं ! अपने सिधांत , संस्कार , सभ्यता , बड़े छोटे का आदर – सम्मान ! लेकिन यह एक मकडजाल है वह मकडजाल जिसे अंग्रेजो ने बुना और हमें उलझाया ! वयवस्था का एसा मैकालेम्यी जाल जिसमे हम और आप सभी बस फसे हुए हैं ! ऐसी प्रतियोगिता जिसमे हार भी हमारी है और केवल हार ही हमारी है ! चुकी इस वयवस्था में जहा एक और भारतीयता खो रही है वही दूसरी और भारत का भविष्य सिगरेट , बियर और सेक्स के नशे में चूर है !

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

akraktale के द्वारा
July 9, 2012

विकास जी नमस्कार, मै आप से इस बात पर बहुत सहमति नहीं रखता क्योंकि आपने सिर्फ एक पहलू देखा है वह भी अधूरा सा. यकीनन लडके लडकियां शहरों में साथ पढ़ते हैं अपने अपने होस्टलों में रहते हैं मगर इसे यौन संबंधों से जोड़कर देखना कतई भी ठीक नहीं लगता. मेरे आंकड़े आपके आंकड़ों के बिलकुल विपरीत हैं. और मैंने तो उस सच्चाई को भी देखा है की बाहर सहपाठी लडके, लड़कियों के लिए काफी मदत्गार साबित होते हैं. जहां हर दिन परिवार का कोई सदस्य साथ नहीं होता तब अनजाने शहर में यह सहपाठी ही एक दुसरे की मदत करते हैं इसको हर शख्स गलत नजरिये से देखना ठीक नहीं है.

    dineshaastik के द्वारा
    July 10, 2012

    विकास जी मैं भी आशोक जी के विचारों से सहमत…..


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